जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के निरीक्षण से पूर्व अपनी तल्लीनता और कर्तव्य के प्रति समर्पण प्रमाणित करने के लिए नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने कुछ निरीक्षकों को चिन्हित किए गए गंदे स्थानों पर खुले में शौच जाने वालों पर सख्ती से कार्यवाही करने के निर्देश दिए। निरीक्षक ने एक अधेड़ व्यक्ति को नाली पर शौच करते पकड़ लिया। निर्देशानुसार वह, उस व्यक्ति का पानी से भरा लोटा छीनकर डाॅंटने लगा,
‘‘क्यों रे अधबूढे़! तुझे स्वच्छता अभियान के बारे कुछ नहीं पता? खुले में शौच करने में तुझे जरा भी शर्म नहीं आती?’’
‘‘ काहे की शर्म ? मैं तो जनम से ही यहीं शौच करता हॅूं, आज तक किसी ने नहीं टोका, तुम कौन होते हो?’’
‘‘ जानता नहीं, मैं नगरनिगम का सफाई दरोगा हॅूं, ज्यादा बड़बड़ मत कर, चल पचास रुपया फाइन जमा कर’’
‘‘ अजीब बात है, शौच के लिये कोई पैसा रख कर लाता है क्या? मेरे पास कुछ नहीं है, जो कुछ करना है कर लो?’’
‘‘ चल! तो मुर्गा बन जा ’’ दरोगा ने लोटे का पानी वहीं पर उड़ेलते हुए कहा।
इतने मंे स्वाथ्य अधिकारी निरीक्षण करने वहीं पहॅुंचे और सड़क पर मुंह में भरी पान तम्बाकू की पीक पिच्च करते हुए बोले,
‘‘ क्या बात है दरोगा? ’’
‘‘ सर! ये नाली पर शौच करते पकड़ा गया है, फाइन नहीं दे रहा, मुर्गा भी नहीं बन रहा?’’
‘‘ क्यों बे! गंदगी करता है और आॅंखें दिखाता है’’
‘‘ सर! आप मेरे इस काम को तो गंदा कह रहें हैं जिसे मैं बाल्यावस्था से करता रहा हॅूं पर आपने जो अभी अभी स्वच्छ सड़क को अपनी पीक से लालपीला कर दिया है वह क्यों नहीं दिखता? उसका फाइन कौन देगा?’’
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