‘‘बाबूजी! बाबूजी! एक रुपया दे दो’’, हाथ फैलाए एक स्कूली बच्चे ने बीच बाजार में एक सज्जन के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
‘‘ तुम तो स्कूल में पढ़नेवाले लड़के लगते हो? भीख माॅंगते हो? स्कूल की यूनीफार्म किसने दी?’’ लगातार प्रश्नों की बौछार सज्जन ने कर डाली।
‘‘ जी बाबूजी। मैं कक्षा 4 का छात्र हॅू, ये स्कूल यूनीफार्म मुझे मामा ने दी है’’, लड़का डरते डरते बोला।
‘‘ तो क्या तुम्हारा मामा तुम से भीख मँगवाता है?’’
‘‘ नहीं नहीं, मामा नहीं, बाप यह काम करवाता है’’
‘‘ पर क्यों?’’
‘‘ वह कहता है, तुम्हारा मामा तुम्हें कपड़े देता है, खाना देता है, किताबें देता है, पर मुझे कुछ नहीं देता, न काम और न खाना, इसलिए तुम स्कूल से लौटते समय लोगों से इतने पैसे तो जरूर माॅंग कर लाना जिनसे मेरी बीड़ी तम्बाखू का सिलसिला बना रहे।’’
‘‘ और माॅं क्या करती है?’’
‘‘ वह भी भीख ही माँगती है बाबूजी।’’
‘‘ हद हो गई, आखिर ये भिखारी भी बच्चे क्यों पैदा करते हैं?’’ बड़बड़ाते हुए सज्जन चलते बने।
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