ठाकुरों की सभा में नेता जी बोले, ‘‘उठो महाराणा प्रताप के बंशजो! आज तुम्हारी आन, बान और शान को इन लुटेरों ने ललकारा है। इन्हें हम दिखा देंगे कि इनकी औकात क्या है। राजपूतों को हम उसका गौरव दिला कर ही चैन लेंगे.......’’
अब वे ब्राह्मण बहुल क्षेत्र में पहुँचे,
‘‘ ब्राह्मणों ने ही सबको ज्ञान बाॅंटकर उन्नत बनाया है, वे सबके पूजनीय हैं, वे हमारे गुरु हैं, पथप्रदर्शक हैं, वे सब को बाॅंटते ही रहे हैं पर किसी से चाहा कुछ नहीं है, हम उन्हें उनका शीर्ष स्थान दिलाकर ही मानेंगे....’’
किसानों की सभा में जा कर दहाड़े ‘‘किसान सबके अन्नदाता हैं, उनकी जरूरतों को पूरा कौन करेगा? उन्हें बीज, खाद, विजली, पानी और संरक्षण कौन देगा? हम देंगे। खेती को लाभदायी उत्पादों और उद्योग से कौन जोड़गा? हम जोड़ेंगे।’’
और मजदूरों के बीच बोले, ‘‘मजदूर यदि न हो तो ये अट्टालिकाएं कौन बनायेगा? रोड कौन बनायेगा? रेल की पटरी कौन विछायेगा? फेक्टरियों में कौन काम करेगा? सबको पल पल सहायता देने के लिये हमारे यही भाई काम आते हैं और इनकी जरूरतों के लिये कोई चिंता नहीं करता, हम इन्हें इनका हक दिलायेंगे, उनके परिश्रम का उन्हें उचित मूल्य हम दिलायेंगे....’’
राजनीति का ‘क ख ग’ सीखने मैं नेता जी के साथ हर सभा में उनके साथ ही रहा करता, मैंने पूछा, ‘‘ आप जाति या काम के अनुसार हर क्षेत्र में उनके ही हित की बात करते हैं, पर क्या सभी को अपने कहे अनुसार कुछ कर पाएंगे?’’ वे बोले,
‘‘बेटा ! मनोविज्ञान के इन तथ्यों को अच्छी तरह समझ लो कि इस प्रकार के ज्योसेंटीमेंटस, सोसियो सेंटीमेंटस, और ज्योसोसियो सेंटीमेंटस भड़का कर बोट कैसे लिये जाते हैं; समाज के हर वर्ग का दोहन कर किस प्रकार किया जाता है......।’’
‘‘ देश की जनता क्या इतनी भोली है ......?’’ मैं सोचता रहा, सोचता रहा।
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